Saturday, 21 December 2019

इस मुल्क का होना है तो...

इस मुल्क का होना है तो,
कागज संभालकर रक्खों।
दिल में चाहे गोडसे रक्खों,
जेब में गांधी संभालकर रक्खों।।

आपको इस मुल्क में,
पैदा होने की जरूरत नहीं,
घुसपैठिए अगर हो तुम तो,
शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं।
थाम कर हाथ झूठ का,
धरम संभालकर रक्खों।
इस मुल्क का होना है तो,
कागज संभालकर रक्खों।।

बिक गया है मीडिया,
बदल गई है सच्चाई।
ये बात ना फिर हम से कहेना,
ये बात ना हम तक क्युं आई।।
कान और आंखें नोच लो अपनी,
मुंह में जबान दबाकर रक्खों।
इस मुल्क का होना है तो,
कागज संभालकर रक्खों।।

इस मुल्क का होना है तो,
कागज संभालकर रक्खों।
दिल में चाहे गोडसे रक्खों,
जेब में गांधी संभालकर रक्खों।।

Thursday, 19 December 2019

जंग

ये जो जंग हम लड़ रहे हैं,
ये जंग नफरत के खिलाफ है,
मुहब्बत के लिए है,

मुहब्बत,
हर जात से,
हर धरम से,
हर शख्स से,
हर कौम से,
हर किसी से,

इस जंग मे मुश्किलें तो आएंगी,
हर तरीके से आवाज दबा दी जाएगी,
लेकिन हमें रुकना नहीं है,
नफरत के सामने झुकना नहीं है,
लडते रहेना है,

हमें लडना है,
आजादी को याद करके,
अशफाक को याद कर के,
भगत सिंग को याद करके,
राम प्रसाद को याद करके,
मौलाना आजाद को याद करके,
हमें लडना है अपनी विरासत के लिए,
हमें लडना है आपस में मुहब्बत के लिए,
हमें लडना है गांधी का सहारा लेकर,
हमें लडना है एकता का इशारा लेकर,
हमें लडना है अपने मुस्तकबिल के लिए,
हमें लडना है आनेवाले कल के लिए,
हमें लडना है...
इन्किलाब जिंदाबाद!
इन्कीलाब जिंदाबाद!!

Tuesday, 26 November 2019

संविधान छीन लो ...

जो दिया था 'बाबा' ने, सब वो इनसे छीन लो,
एकता भी छीन लो, एकात्मता भी छीन लो।
वो किताबें, वो कलम, वो कापीयां भी छीन लो,
पढ़ने लिखने का मिला वो हक भी इनसे छीन लो।।

हम भारत के लोग कहकर उसने सबको जोडा था,
ये भी इक ताकत है इन की, ये भी इनसे छीन लो।
वो जो संविधान को तकिया बनाके सोए हैं,
जागने से पहले उनके, संविधान छीन लो।।

Thursday, 31 October 2019

मेरे पीछे इक दुनिया है...

मेरे पीछे इक दुनिया है,
मेरे आगे इक दुनिया।
इक छोडूं तो मैं नहीं,
इक छोडू तो चैन नहीं।।

कितने हम लोगों से मिले,
कितने रिश्तेदार बनें।
रिश्ता इंसानियत का यारों,
बोलो जाने कौन नहीं।।

बुजुर्गों के सामने हम,
सर को झुकाया करते हैं।
इसलिए ऊंचा सर है अपना,
बात तो कोई और नहीं।।

एक ही रब के सारे बंदे,
नाम अलग और धाम अलग।
जब चलना जोर है उसका,
चलना कोई जोर नहीं।।

Tuesday, 22 October 2019

दिया

यहां पर जहां पर मैं आया गया हूं,
लाया गया या, बुलाया गया हूं।
अंधेरे से मैं कितने घिर तो गया हूं,
खयालों से अपने जलाया गया हूं।।

बस मोम हूं मैं, ना कुछ और हूं मैं,
हवा से मै कितना, सताया गया हूं।
मुझे ना ही पूछो अंजाम मेरा,
धुआं बन के बादल में छाया गया हूं।।

मगर एक कह दूं, मै बात सबको,
दिए से दिया मै जलाया गया हूं।
की होगा उजाला, जहां में हमारे,
उम्मीद पर इस, लगाया गया हूं।।

Sunday, 15 September 2019

तुम, जोहरा जबीं,

वो कहते हैं के मैं झूठ कहेता हूं,
झूठी तारीफ करता रहता हूं,
उनसे गुजारिश है...

उनसे गुजारिश है के कुछ यूं करें,
कभी फुरसत में आईना लेकर,
खुद को देखें वो प्यार से यूं कर,
लेके नजरें अपनी जुल्फों से,
ले चलें भौंहों तरफ धीरे से,
फिसलकर फिर अपने गालों से,
आए होटों की तरफ हौले से,

मुस्कुराहट भर कर, दिल की चेहरेपर,
फिर थुड्डी की तरफ आ जाए,
थोडा सा और फिर से मुस्काए,
थोडा सा और फिर से मुस्काए,

चल दें फिर होंट से ऊपर की ओर,
नाक की छोर से आंख का छोर,
अपनी आंखों को आंख में भरकर,
देख लो एक नजर छुप छुप कर,
फिर ना कहेना की कोई और है वो,
आईना है या कुछ और है वो,

फिर शरमाके पूछ लेना ये,
क्या मेरे साथ चाय तुम लोगे?
वो कहें 'हॉ' तो ये समझ जाना,
जिसकी तारीफ मैंने की थी कभी,
हॉ, वही तो हो तुम जोहरा जबीं,
हॉ, वही तो हो तुम जोहरा जबीं...

उन अमीरों से पूछकर देखो

उन अमीरों से पूछकर देखो,
इतने बडे वो हुए कैसे,

किस जंगल का काटा है टुकडा,
किस के पानी की, चोरी की है,
किस की झोपडी उजाडी है,
किस के हाथों से रोटी है छीनी,
उन अमीरों से पूछकर देखो,
इतने बडे वो हुए कैसे।

वो, जो उनके जात का ना था,
वो अंधेरे में आज तक क्यूं है,
वो जो कहते हैं सबका साथ रहे,
इतने ऊंचाई पे वो अलग क्यूं हैं,
उन अमीरों से पूछकर देखो,
इतने बडे वो हुए कैसे।

मैंने देखा है उनका सारा जुगाड,
इक जहर सा फैला रक्खा है,
कोई आवाज ना उठाए कभी,
भीड तंत्र ऐसे सजा रक्खा है,
उन अमीरों से पूछकर देखो,
इतने बडे वो हुए कैसे।

मै तो जागा हूं आप भी जागो,
की चौकीदार नहीं है कोई,
दिल में अपनी, नफरत की जगह,
भर दो प्यार भरा गीत कोई,
उन अमीरों से पूछकर देखो,
इतने बडे वो हुए कैसे।

अपना गीत जब सुनेंगे वो,
पसीने उनके छूट जाएंगे,
मिट्टी पैरों से खिसक जाएगी,
चलते चलते वो लड़खड़ाएंगे,
उन अमीरों से पूछकर देखो,
इतने बडे वो हुए कैसे...

Monday, 9 September 2019

श्रावणबाळ

फर्ज का कर्ज अदा कर दूं, एहसान का इंतजाम कैसे करुं।
मैं गांजा शराब पीकर, माॅ-बाप को सलाम कैसे करूं।।

मैं ही था उनके सारी, जिंदगी भर की कमाई और।
बुरी लत में खुद को मैं, खर्च तमाम कैसे करूं।।

मजबूत चाहिए लाठी वो, जिसको सहारा बनना है।
अपनी कमजोरी का जिक्र, सरे आम कैसे करूं।।

बैठ के जिनके कंधे पर, दुनिया देखी थी मैंने।
उन बूढे कंधों की मैं, अब शाम कैसे करूं।।

जाने क्यूं स्कूल में हमको, श्रावणबाळ पढ़ाते थे।
मैं थोडी ना श्रावणबाळ हू, माॅ-बाप की खिदमत कैसे करुं।।

Sunday, 8 September 2019

चलो ऐसा कर के देखते हैं...

चलो ऐसा कर के देखते हैं,
मौब लिंचिंग वाली सड़क से गुजर के देखते हैं।
लोग चुप नहीं हैं, मैं ही बहेरा हूं शायद,
लोगों के होटों पे नजरें फेर के देखते हैं।।

क्या लोग टूटने लगे हैं इक दूजे से,
चलो हम उनको जोड के देखते हैं।
उम्मीद है किसीको संविधान तो याद होगा,
वो किताब साथ ले जा कर के देखते हैं।।

ये क्या उदासी छाई है हर जगह,
चलो "शैलेंद्र" का "तु जिंदा है" छेडके देखते हैं।
या मन करे भजन सुनने का,
"शकील बदायूंनी" का भजन सुनके देखते हैं।।

ये लोग पराए से महसूस होते हैं,
चलो दिल को झुटा समझ के देखते हैं।
क्या मुझे अब लोगों पे यकीन नहीं करना चाहिए,
मेरे देश के लोग हैं, यकीं कर के देखते हैं।।

Friday, 6 September 2019

मेरी भी खबर ले...

आ मिल तु कभी मुझको,
मेरी भी खबर ले,
ऐ बेखबर तू कभी,
मेरी भी खबर ले।

तु है अगर सिक्ख तो मैं सिक्ख बनूंगी,
तेरे लिए गुरू को प्रणाम करूंगी,
तु है अगर मुसलमा तो मुसलमान बनूंगी,
अपना बनाके तुझको, या अल्लाह कहूंगी,
तु है अगर जो क्रिश्चन तो भी खुश हूं मैं,
ईसा मसीह को भी अपना कहूंगी मैं,

मै हूं तेरे लिए ना जाने कितने सफर से,
तेरे लिए ही गुजरी हूं अंजान डगर से,
दुनिया को देखने दे मेरी जात पात को,
तु देख ले बस मुझे इन्सा की नजर से,

आ मिल तु कभी मुझको,
मेरी भी खबर ले,
ऐ बेखबर तू कभी,
मेरी भी खबर ले...

Thursday, 29 August 2019

दूरी

तेरे और मेरे बीच की दूरी
मैं कुछ इस तरह मिटा रहा हूं।
वो गीत जो तुम गुनगुनाती थी
वो गीत अब मैं गुनगुना रहा हूं।।

तुम्हारे दुपट्टे की खुशबू लेकर,
तसव्वुर में तुमको ला रहा हूं।
तुम आकर जगाओगी,
इस खयाल में सोता जा रहा हूं।।

इक हफ्ते को मैं दिन रात,
घंटों, पहर में तोड बिता रहा हूं।
मैं सब्र अपने आप का,
हर पल आजमा रहा हूं।।

तेरे और मेरे बीच की दूरी,
मैं कुछ इस तरह मिटा रहा हूं।
वो गीत जो तुम गुनगुनाती थी,
वो गीत अब मैं गुनगुना रहा हूं...

कई टुकड़ों में बटती जा रही है

जिंदगी कई टुकड़ों में बटती जा रही है,
बस दिखावे में सिमटती जा रही है।

कोई पैदा हो सिख तो, सुरिंदर हो,
हो हिन्दू तो, राम या नरिंदर हो,
हो मुसलमान तो हो ओसामा या ओवैसी,
हो बौद्ध तो, भीम या गौतम हो,
जात धरम में कितने, बटती जा रही है,
बस दिखावे में सिमटती जा रही है।

इस आगे हम नहीं बढ़नेवाले,
किसी इन्सा के लिए हम नहीं लड़नेवाले
अपने छोटी सी दुनिया में सिमट जाएंगे हम,
कीड़े की तरह जी कर, मर जाएंगे हम,
इंसानियत अब मिटती जा रही है,
बस दिखावे में सिमटती जा रही है।

है तोडना दिल का अब मजाक की बात,
संजीदा बात मेरी, बाकी है मजाक की बात,
जब भी करता हूं मैं यारों में बस नाम की बात,
भूल जाता हूं मैं अक्सर संविधान की बात,
वो liberty, equality, fraternity नहीं याद आ रही है,
बस दिखावे में सिमटती जा रही है।

जिंदगी कई टुकड़ों में बटती जा रही है,
बस दिखावे में सिमटती जा रही है।

जहान-ए-'झुबेदा'

जिंदगी आमादा जिए जाने को,
उसपे है याद तेरी सताने को।
खो कर सब तुझको जो पा लिया,
और क्या रह गया है पाने को।।

तेरी आदत सी हो गई है अब,
जान दे दूं क्या ये छुडाने को।
मर भी जाऊं तो रूह भटकेगी,
लौट आएगी सनम खाने को।।

भरी महफिल में नाम लेके तेरा,
हुए मशहूर हर जमाने को।
कोई पूछे के कहाॅ चलें हैं 'वसीम',
चलें जहान-ए-'झुबेदा' बसाने को।।

Thursday, 22 August 2019

जागो, आवाज उठाओ

जागो, आवाज उठाओ
जागो, आवाज उठाओ

समाज तोड तंत्र का हिस्सा ना बनो,
समाज तोड वाणी का किस्सा ना बनो।
सोए हो तो जाग जाओ,
बेहोश हो तो होश में आओ।।
जागो, आवाज उठाओ
जागो, आवाज उठाओ

अलग अलग फूलों से बगिया खिल जाती है,
अलग अलग रंगों से तस्वीर बन जाती है।
इन बागों में बहार लाओ,
इस तस्वीर में जान लाओ।।
जागो, आवाज उठाओ
जागो, आवाज उठाओ

लोकतंत्र बचाने हेतु जागना है,
जिम्मेदारी से अपनी नहीं भागना है।
बगीचे के सर पे आग लगी है जाग जाओ,
"हम भारत के लोग" वाला "हम" बनके दिखाओ।।
जागो, आवाज उठाओ
जागो, आवाज उठाओ...

Thursday, 8 August 2019

मैं अपने भगवान को बचा रहा हूं?

मैं अपने भगवान को बचा रहा हूं,
उस इंसान की जान लेकर,
जो मेरे भगवान को,
उसका भगवान नहीं मानता,

मैं अपने भगवान को बचा रहा हूं,
खुद को किसी का गुलाम बनाकर,
जो मुझमें नफरत,
और सिर्फ नफरत का जहर घोल रहा है,

मैं अपने भगवान को बचा रहा हूं,
कुछ पैसों के एवज,
अपनी आजादी गवाकर,
जिसके लिए मेरे पुरखों ने जान दी,

मैं अपने भगवान को बचा रहा हूं,
देश के नाम पर,
जिसकी किसी को फिक्र नहीं है,
और जिसको है वो चुप हैं,

मैं अपने भगवान को बचा रहा हूं,
मेरे भगवान को भुलाकर,
जो भूके को रोटी, प्यासे को पानी देने की बात करता था,
उच नीच, अमीर गरीब कोई भेद नहीं करता था,

लेकीन,
जिन लोगों ने मुझे भगवान बचाने को कहा है,
उनका भगवान...?
उनका भगवान स्विस बैंक में,
बडा सा आंकडा बना बैठा है।।

Friday, 2 August 2019

मौत का इजहार...

मौत का इजहार किया है कभी?
नहीं, तो फिर करके देखो,
खयालों में ही सही,
एक बार मर के देखो,
अच्छा लगेगा।

अच्छा लगेगा,
जब सांसे रफ्ता रफ्ता बोझिल हो जाएंगी,
सांस लेना मेहनत का काम मालूम होगा,
आंखों के सामने जो नजारा होगा,
वो भी धुंधलाता जाएगा,
दिल का धड़कना कम होते होते रुक सा जाएगा,
आप महसूस करोगे आप के रगों में दौड़ते हुए खून को,
जो धीरे धीरे ठहर रहा होगा,
और आप को हल्का हल्का सुनाई दे रहा होगा,
लोगों का रोना।

जो रो रहे होंगे उनका शुक्रिया अदा करें,
उस से ज्यादा वो कुछ कर भी नहीं सकते,
उनका भी शुक्रिया करें जो आप को,
आप की मंजिल तक पहुंचाने वाले हैं,

आप को पता भी नहीं चलेगा की,
कब आप का बदन ठंडा पड़ गया,
आप को बड़े प्यार से आप के चाहनेवाले घुस्ल देंगे,
आप को अल्लाह के दरबार में पेश होने के लिए,
साफ शफ़्फ़ाक कफन पहनाया जाएगा,
सूरमा, इत्तर लगाया जाएगा,
और फिर,
शुरू होगा आपका आखरी सफर,
कब्रस्तान तक,
रास्ते में आपको कई जाने अनजाने लोग मिलेंगे,
वैसे ही जैसे जिंदगी में मिले थे,
सब को मोहब्बत से अलविदा कहीयेगा,
आप कब्रस्तान पहुंच जाएंगे,
आप के लिए नमाज - ए - जनाजा, आखरी दुआ,
दरूद-ओ-शरीफ पढा जा रहा होगा,
आप को प्यार करनेवाले
अपने हाथों से आप को मिट्टी के हवाले करेंगे,
आप को कब्र में रखा गया होगा,
आप को आप पर पड़ रहे मिट्टी की आवाज सुनाई देगी,
फिर उनके कदमों की आवाज जो,
इस से आगे आप के साथ नहीं आ सकते,
और इस तरह एक खेल खतम हो जाएगा,
शायद किसी और खेल के शुरू होने के लिए,

अब अपने खयालों से बाहर आईये,
और सोचिये,
आप क्यू जी रहे हैं?

Thursday, 1 August 2019

औरत और आदमी

तुने उसको दिल था सौपा,
दिल पे उसने वार किया।
तुने जब उसको ठुकराया,
उसने तुझको प्यार किया।।

नर्म शीशा था दिल तेरा,
तोड कर बेकार किया।
दुनिया की नजरों में फिर,
तुझको गुन्हागार किया।।

तु थी इन्सा, पहले से ही,
हुकूक तुझको मिलने थे।
देके तेरे हुकूक तुझको,
तुझ पर फिर उपकार किया।।

रब ही जाने, रब ने तुझको,
किस मिट्टी का बनाया है।
उसकी सजा का दिन जब आया,
तुने दिन इतवार किया।।



Friday, 26 July 2019

हसते हुए

हसते हुए जागता है,
हसते हुए सो लेता है।
कितनी आसानी से वो
जिंदगी के साथ हो लेता है।।

हालात से लडने की,
ये तरकीब निकाली है।
हर हालात में वो बस,
हलकेसे मुस्कुरा देता है।।

सुना है उसकी आंखों में
कभी आसू नहीं दिखते।
वो अपनी आंखे,
पानी से ही धो लेता है।।

वो मशहूर है अपनी,
खुशमिजाजी के लिए।
सारे गम हंसी की,
चादर में छुपो लेता है।।

इक सुबह उसका,
तकिया मिला गीला।
पता चला वो रातों में,
जी भर के रो लेता है।।

अक्शा

जुल्फों को झटक कर तेरा बांध लेना,
धीरे से रात का सुबह होना।
वो मंजर तेरे दीदार का,
नामुमकिन है लफ़्ज़ों में बयाॅ होना।।
मेरे इस दिल से पूछो,
सुनने को जो तरसता है।
बातों से किसी की यूं,
बचपन का गुमाॅ होना।।
ये मासूमियत ही है,
'अक्शा' जो मिली है तुझको।
शायद ही देखा होना,
शायद ही सुना होना।।

Monday, 22 July 2019

दूरी सही ना जाए

दूरी सही ना जाए,
तेरे बिना मुझको,
कुछ और नजर ना आए,

दूरी सही ना जाए,
तेरे बिना मुझको,
कुछ और नजर ना आए,
दूरी सही ना जाए।

कभी सोचा नहीं पहले
के दिन यूं भी बदलेंगे
तुम हो जाओगी दूर हमसे
और हम यूं तड़पेंगे
दूरी सही ना जाए,
तेरे बिना मुझको,
कुछ और नजर ना आए,
दूरी सही ना जाए।

ये जो ऊंची पहाड़े हैं
हर पल तुमको याद करें
और इन पहाड़ों के संग हम
रब से यह फरियाद करें
दूरी सही ना जाए,
तेरे बिना मुझको,
कुछ और नजर ना आए,
दूरी सही ना जाए।

(जाजाई सिंग्सित के "तोल्थिंग सेहेई नहि" की धुन से मुतासिर)

Thursday, 18 July 2019

धुआं

मेरे अंदर भी धुआं है,
मेरे बाहर भी धुआं।
धुंधले धुंधले रास्ते है,
मंजिले भी है धुआं।।

बाप ने सोचा था मेरे,
बन के सूरज आऊंगा।
ये गरीबी का अंधेरा,
दूर मै कर पाऊंगा।
कैफ का ग्रहण लगा की,
कुछ ना दिखता, बस धुआं।
मेरे अंदर भी धुआं है,
मेरे बाहर भी धुआं।।

यार कोई मेरा जो,
मुझको बुलाए प्यार से।
बात धुए की निकाले,
रद्दी के अखबार से।।
पाता हूं खुदको अकेला,
छट जो जाता है धुआं।
मेरे अंदर भी धुआं है,
मेरे बाहर भी धुआं।।

है गुरूर -ए- मिट्टी मुझको,
मिट्टी में मिल जाऊंगा।
पर रहूंगा जिंदा जब तक,
मै धुआं बन जाऊंगा।।
लेके जाएगी हवा,
जैसे गुबारे इक धुआं।
मेरे अंदर भी धुआं है,
मेरे बाहर भी धुआं।।

Tuesday, 16 July 2019

चू तिया पा ना पाया करो...

मै इस धरम का, तू उस धरम का,
स्यापा ना पाया करो हाय, स्यापा ना पाया करो।
धरम स्थल जाना, तो आपेही जाओ,
इत्थे ना आया करो हाय, इत्थे ना आया करो।।

मेरा धरम है सबसे नियारा,
सबसे प्यारा, सबसे नियारा,
चू तिया पा ना पाया करो हाय, चू तिया पा ना पाया करो...
स्यापा ना पाया करो...

कोई तुम्हें आके उल्लू बनाए,
झगड़ा लगाए, दंगे कराए,
बहेक ना जाया करो हाय, बहेक ना जाया करो।
स्यापा ना पाया करो...

धरती है सबकी, संग संग है रहना,
अपने ही रस्ते है सबको ही चलना,
नफरत ना पाया करो हाय, नफरत ना पाया करो।
चू तिया पा ना पाया करो...
स्यापा ना पाया करो हाय, स्यापा ना पाया करो...

Monday, 15 July 2019

वो दोनों

वो दोनों, साथ नहीं रहते हैं, मगर फिर भी,
मैंने देखा है दोनों को गले मिलते हुए।
रात, सुबह गले मिल के चली जाती है,
दिन, शाम गले मिल के चला जाता है।।

मैं सुबह शाम, जब भी इनको, देखता हूं,
कोई अपना सा मुझको याद आ जाता है।
हम भी है दूर, साथ नहीं है फिर भी,
जब भी मिलते हैं, हम भी गले मिलते हैं।।

वो दोनों, साथ नहीं रहते हैं, मगर फिर भी,
मैंने देखा है दोनों को गले मिलते हुए...

Saturday, 13 July 2019

जाने कितने वसीम हैं मुझमें

जाने कितने वसीम हैं मुझमें,
मै कितना अजीब सा हूं।
साथ में खुद के बचपन से हूं,
खुद को ढूंढता रहता हूं।।

वो वसीम जो नादाॅ है,
गया नहीं लडकपन है।
भरी जवानी में भी सूझता,
उसको हर पल बचपन है।।

इक वसीम वो भी है,
जो शायर बना फिरता है।
किस्से, कहानियों के बीच,
वो लायब्रेरी में मिला करता है।।

इक वसीम वो है,
जो गाता और बजाता है।
धुन में अपनी होता है और,
अपनी ही धुन गाता है।।

एक वसीम वो है,
जो यारों के संग रहता है।
कभी झूटी, कभी सच्ची,
बातें कई करता है।।

इक वसीम जो देख के दुनिया,
दुनिया से उखड़ता है।
देख के जुल्मों सितम सारे,
आंखें बंद करता है।।

इक वसीम जो खोया है,
कहीं रात अंधेरे में।
ना मिले तो बेहतर है...
ना मिले तो बेहतर है...

Thursday, 11 July 2019

मेरा धरम

मुझे हक नहीं है, यारों जीने का,
यारों मुझको अब, मर जाना चाहिए।
या बांध के खुद को किसी बडे धर्म से,
मुझे धरम का गुलाम, हो जाना चाहिए।।

किसी और का वजूद नहीं, बस मेरा धरम
सारे जमाने को ये समझाना चाहिए।
धर्म के नाम पर, धर्म को तोडकर,
इक नया धर्म हमको बनाना चाहिए।।

कोई जहां में हो तो मेरे धरम का हो,
जात पात सबको समझाना चाहिए।
मेरे धरम का हो तो मुझसे भी छोटा हो,
जात का टाईम बाॅम लगाना चाहिए।।

मेरे धरम में हो भले लाख बुराई,
औरों को शीशा हर पल दिखलाना चाहिए।
यारों की अच्छाई में फायदा यही तो है,
नाजायज फायदा उठाना चाहिए।।

फर्क कोई झूट और सच में ना रहे,
बातों को इस तरह उलझाना चाहिए।
तोडना हो सच तो बस इतना ही करें,
चौथा स्तंभ तोडना, मिटाना चाहिए।।

जो तैरती जाती हैं बहाव के खिलाफ,
वो मछलियां जाल में फंसाना चाहिए।
बचना, ना देख ले हमको कहीं ' रवीश '
उजाले में हमको नहीं आना चाहिए।।

Saturday, 6 July 2019

तुम्हारी यादें और इंतजार...

तुम्हारी यादें,
तुम्हारी अदाओं से भी ज्यादा जानलेवा हैं,
तुम्हारे यादों से बचने की सभी नाकाम कोशिशों के बाद,
तुमसे मिलने का वक़्त तय करता हूं,
तो मेरी जान लेनेवाली चीजों में
इक और चीज शुमार हो जाती है,
इंतजार...
इक लंबा सा इंतजार,
उस वक़्त से, जब से मनसूबा बनाया है,
उस वक़्त तक, जब तक तुम्हारी जानिब सफर शुरू नहीं होता,
और फिर बेचैनी, बेताबी तब तक, जब तक तुम्हारा दीदार नहीं होता,
इक दिन का, मगर इक साल की तरह लगने वाला,
इंतजार...

Monday, 1 July 2019

बारिश

सुबह को मैंने आंखें खोली,
खिड़की से एक चिड़िया बोली,
देख ले बाहर जा कर बंदे,
रात में कुछ है बारिश हो ली,

मैंने बाहर जाकर देखा,
सारे खुश थे धरती गीली,
सर्द हवा थी, रूत भी जवाॅ थी,
मैं वापस बिस्तर पर लौटा,

मैंने फिर तकिए को देखा,
आंसू से वो भी था गीला,
मैं जब वजह सोचने बैठा,
कान में तेरी दूरी बोली,

"बस बहुत, अब मिलने आओ,
दिल को मेरे ना तड़पाओ,
साथ तुम्हारा मैं जो पा लूं,
बारिश में मैं भी तो न्हा लूं,"

मैंने फिर बाहर को देखा,
खूबसूरत एक नजारा,
सारा नजारा धुंधला हो गया,
हो गई थी आंखें जो गीली...

Thursday, 27 June 2019

इंतजार में थे...

आ आ के जा रहे थे, आकर बरस गए,
बादल आग लगने के इंतजार में थे।
हमने किया था खुद को, कब से तेरे हवाले,
हम भी तो यार जलने के इंतजार में थे।।

तेरे साथ एक लम्हा, जिंदगी जी चुके हम,
अब तो बस मौत के इंतजार में थे।
और तेरी खुशबू का लालच दे रही हैं सांसे,
मर तो जाते, तेरी खुशबू के इंतजार में थे।।

Wednesday, 26 June 2019

दिल कबूतर

दिल कबूतर कबूतर दिल कबूतर रे
दिल कबूतर कबूतर दिल कबूतर।
बैठे कभी इस शाख पर उस शजर पर रे
कबूतर दिल कबूतर,
ना कोई भाये इसको, लड़ाई चोंच सभी से रे,
कबूतर दिल कबूतर।।

होकर रहना किसीका आदत नहीं इसकी,
वफा किसी से करने की फितरत नहीं इसकी,
उतर जाए कभी इसके, कभी उस के छत पर,
कबूतर दिल कबूतर...

आवारागर्दी से, हैरान है ये,
खुद अपनी आदतों से परेशान है ये,
सोच रहा है कैसे बनें खुद से ही बेहतर,
कबूतर दिल कबूतर...

मोहब्बत है दिल में है, आजादी प्यारी इसे,
बेबाक हवाओं से, है यारों यारी इसे,
कभी उतरे मंदिर पे, मस्जिद पे जाये उतर,
कबूतर दिल कबूतर...

बैठे कभी इस शाख पर उस शजर पर रे
कबूतर दिल कबूतर...


Tuesday, 25 June 2019

जब तुम्हें देखता हूं


बहुत दिनों से जानता हूं मैं तुमको, 
एक दो बार बात भी कर चुका हूं,
मगर, जिस दिन से तुमको देखा था,
उस दिन से लेकर आज तक,
मैं जब भी तुम्हारे बारे में सोचता हूं,
तुम्हें देखता हूं,
या बीच राह में तुम, जब भी तुम नजर आती हो,
मैं सोचता हूं कि यह कैसे मुमकिन है,
किसी का चेहरा इतना जादुई कैसे हो सकता है,
के उस को देखूं तो कुछ और ना देखूं,
के उस को सोंचूं तो कुछ और ना सोचूं,
के उस को समझूं तो कुछ और ना समझूं,
कि उसको चाहूं तो कुछ और ना चाहूं,
शायद, मै सब कुछ भूल जाता हूं,
जब तुम नजर में आती हो,
शायद खुद को भी भूल जाता हूं,
तुमको लगता होगा गुरूर मुझमें,
लेकिन मैं तुम से शरमाता हूं,
शायद, डरता हूं की दिल की बात कहीं बता ना दूं,
कभी सोचता भी हूं की बता दूं तुमको,
बहुत दिनों से जानता हूं मैं तुमको, 
एक दो बार बात भी कर चुका हूं,
मगर, जिस दिन से तुमको देखा था,
उस दिन से लेकर आज तक,
मैं जब भी तुम्हारे बारे में सोचता हूं,
तुम्हें देखता हूं.....

Thursday, 20 June 2019

दरख़्त


मै आया था मै चला गया, मुझे हसते हसते विदा करो,
मेरी छांव को, मेरे पत्तों को, ना दिल से अपने जुदा करो।

जो हो कभी कोई धूप में, उसे छांव देना ना भूलना,
उसे नाम धाम औे जात धर्म, ये कोई बात ना पूछना।
है यही दुआ की मेरी तरह, तुम भी उसको याद हो,
मै बाट खुशियां खुश रहा, और तुम भी ऐसेही शाद हो।।

मेरा घर तुम्हारे दिल में और, किसी दिल में तुम्हारा भी हो घर,
मैने जी ली अपनी जिंदगी, ना कोई गिला है ना कोई है डर।
तुम जीना अपनी जिंदगी, कभी अपना फर्ज ना भूलना,
जो कभी हो कोई धूप में, उसे छांव देना ना भूलना।।

 मै आया था मै चला गया, मुझे हसते हसते विदा करो,
मेरी छांव को, मेरे पत्तों को, ना दिल से अपने जुदा करो...

Sunday, 26 May 2019

नया तो कुछ भी हुआ नहीं है


नया तो कुछ भी हुआ नहीं है,
नहीं तो, कुछ भी हुआ नहीं है,

चेहरे नए-पुराने आए,
वादे नए बताने आए,
कब से राहें देख रहे हैं,
शायद कोई निभाने आए।
हर बार जो हो रहा था,
इस बार भी हुआ वही है,
नया तो कुछ भी हुआ नहीं है,
नहीं तो, कुछ भी हुआ नहीं है।।


लगी मिली-भगत की बोली,
जीत गई चोरों की टोली,
नोटों की कीमत लगाकर,
वोटों की गठरी है खोली।
पहले भी जो ठग रहा था,
इस बार भी ठगा वही है,
नया तो कुछ भी हुआ नहीं है,
नहीं तो, कुछ भी हुआ नहीं है।।


अदालतें, कानूनसाजी,
सब पे भारी चाल बाजी,
अंमल दारों की कमर है टूटी,
पैसों तले कलम दबा दी।
जम्हूरियत के चार खंबे,
ढूंढ रहा हूं, क्या कहीं हैं,
नया तो कुछ भी हुआ नहीं है,
नहीं तो, कुछ भी हुआ नहीं है।।




Saturday, 20 April 2019

मी गप्प रहातो...

मी गप्प रहातो,
लोकशाहीला झालेल्या जखमा बंद डोळ्यांनी पहातो,
मी गप्प रहातो,
धर्मांधतेच विष समाजात कालवत असेल कोणी,
एकमेकांवर चिखलफेक करत असेल कोणी,
वाटत असेल मतदारांना वोटा साठी नोट,
दारू मटणाची पार्टी करत असेल कोणी,
मीही वाहत्या नदीत हात धुत जातो,
गप्प रहातो,
लोकशाहीला झालेल्या जखमा बंद डोळ्यांनी पहातो,
मी गप्प रहातो... 

आपलं जसं तसं चालून जातं,
दोन वेळेस जेवण मिळून जातं,
'काहीतरी' करून मिळवली डिग्री,
समोरच्याला हे कळून जातं,
अशा डिग्री वर मी रोजगार मिळवू पहातो,
गप्प राहतो,
लोकशाहीला झालेल्या जखमा बंद डोळ्यांनी पहातो,
मी गप्प रहातो... 

सरकारी ऑफिसमध्ये मी नेहमी 'सेटिंग' करतो,
भ्रष्टाचाराविरोधात असतो पण, अधिकाऱ्यांचे खिसे भरतो,
माझे खिसे भरण्यासाठी कधी दलाली पण करतो,
मी पण इमान विकून श्रीमंत होऊ पहातो,
गप्प रहातो
लोकशाहीला झालेल्या जखमा बंद डोळ्यांनी पहातो,
मी गप्प रहातो... 

भारत माझा देश आहे, पण मला काय त्याचं,
आम्ही भारताचे लोक, पण मला काय त्याचं,
देश चाललाय, कुठेतरी, पण मला काय त्याचं,
राजकारण्यांच्या बुद्धिबळाचा नकळत, प्यादा होत जातो,
गप्प रहातो,
लोकशाहीला झालेल्या जखमा बंद डोळ्यांनी पहातो,
मी गप्प रहातो... 

Tuesday, 9 April 2019

सियासत ना जान ले...

वोट तेरा कोई खरीदें ना ठान ले,
जान ले सियासत, सियासत ना जान ले।
आगाज कुछ तो कर अपने वजूद का,
चाल सियासत दारों की, पहेचान ले।।

क्यू टूट गया है भरोसा-ए-सियासत,
कौन है फैला रहा मेरे देश में नफरत,
क्या हासिल है किसीको इससे,
क्या कुर्सी के लिए छोड दें, आपस की मुहब्बत,
ना मिटने पाए देश की तहजीब जान ले,
जान ले सियासत, सियासत ना जान ले...

जाल जात पात का बिछायेंगे ये जरूर,
मजहब को मुद्दा बनाएंगे ये जरूर,
मन नहीं भरेगा जब इन बातों से,
सेना को बीच में लाएंगे ये जरूर,
तू मगर अपने तजुर्बे से काम ले,
जान ले सियासत, सियासत ना जान ले...

दो पल तेरे कदमों में गिरना है इन्हें,
फिर पांच साल तुमको, कुचलना है इन्हें,
तुम पाई पाई जोड के दे देना बैंक को,
बिज़नेसमेन के लोन माफ करना है इन्हें,
चौकीदार किसके हैं ये बात जान ले,
जान ले सियासत, सियासत ना जान ले...

वोट तेरा कोई खरीदें ना ठान ले,
जान ले सियासत, सियासत ना जान ले।
आगाज कुछ तो कर अपने वजूद का,
चाल सियासत दारों की, पहेचान ले।।

Thursday, 21 March 2019

मेरे यार

मुझे अपने यारों से उम्मीद नहीं है,
ये दुनिया ही कुछ यारों दौलत परस्त है।
मै मुझको मिलने वाले हर शय में मस्त हूं,
वो उसको मिलने वाले हर शय में मस्त है।।

उम्मीदें हैं उसको मुझसे, यूं तो कई,
मेरी एक उम्मीद से, वो पस्त है।
दौलत पास है मगर साफ दिल नहीं,
बस यहीं मेरे यार ने, खाई शिकस्त है।।

सीनेसे लगने वाले भी तोड़तें हैं दिल,
मेरी समझ को ये बडी लंबी सी जीस्त है।
इन्सा गुरूर करता है तेरे जहॉ पे रब,
तू ही बता ये बात, कहॉ तक दुरुस्त है।।

Wednesday, 20 March 2019

आशिकी

मेरी आशिकी है तारीफ रब की,
तेरा गुरूर तेरे हुस्न का है।
तेरा हुस्न है मेरे रब का,
बेखबर क्या तुझे इतना पता है।।

तू जो इतराए यू जो अपने हुस्न पर।
सुरज भी तो ढलता है शाम को मगर।।
याद तुझको रहती नहीं, बात ये अगर,
बता इसमें मेरी भला, क्या खता है।।

तारीफ तेरे हुस्न की, जब करता हूं मैं,
हर लफ्ज़ में अपने रब को मिलता हूं।
माना है मुझमें बुराई लाख मगर,
कोई बुरा खयाल दिल से लापता है।।

Monday, 11 March 2019

शराब के नशे में

शराब के नशे में, तेरा साथ ढूंढता हूं,
हाथों में मै मेरे, तेरा हाथ ढूंढता हूं।
तू पास नहीं, दूर सही, तो चलो दूर ही सही,
मै आप में तेरा वजूद, दिन रात ढूंढता हूं।।

आतीं हैं बहारें तो, आकर चली जाएं,
आयें हसीनाएं, रिझाकर चली जाएं।
भेद पाये दिल को, बस तुम्हारी नजर के तीर,
दिल की गहराइयों में, वो तीर ढूंढता हूं।।

इक उम्र कट रही हैं, कुछ पल ही लग रही हैं,
साथ तेरे दुनिया, महेफिल सी लग रही है।
सांसों के दर्मियाॅ जो फासला है थोडा,
उन फासलों पल में, बस तुम को ढूंढता हूं।।

कली

तेरे जिस्म की सेज मना कर दूं,
मैं कैसे बता तुझको फनां कर दूं।
मोहब्बत के शजर की एक कली हो तुम,
मैं कैसे तोड़ने का गुनाह कर दूं।।

वो ना हुक्म कर जो मैं कर नहीं सकता,
वो ना मांग जिसको मना कर दूं।
तेरे खिलने से खिल जाए बगिया सारी,
आ तेरे वास्ते रब से ये दुआ कर दूं।।

थाम लूं इक हाथ में हाथ तेरा,
दूसरे हाथों से दूर ये जहां कर दूं।
बस मिलाकर नजरें पल भर के लिए,
ना भूले ज़माना वो फसाना कर दूं।।

Wednesday, 6 March 2019

आकाल

जब पानी बहता रहता था,
दिल और बहाओ कहता था।
अब आकाल पडा रहता है,
हम पानी पानी कहते हैं।।

है पानी की किल्लत इतनी,
हम प्यासे ही मर जायेंगे।
ना पाप भी हम धो पायेंगे,
ये सारा जमाना कहता है।।

Saturday, 2 March 2019

अलविदा

अलविदा कह रहे हैं,
जुदा हो रहे हैं,
वक़्त के तगाजे,
अदा हो रहे हैं।

जो नहीं बदलता,
बदलाव ही तो है बस,
बदलाव के जहाॅ में,
हम जो बदल रहे हैं।।

मजबूरी है कोई
शौक नहीं यारों,
छोड़कर ये मंजिल,
नई राह चल रहे हैं।

जो वक़्त है गुजारा,
ता उम्र होगा दिल में,
जिस वक़्त के साये में,
एहसास पल रहे हैं।।

Monday, 25 February 2019

उस रात...

उस रात,
जिस रात हम कुछ कदम साथ चले थे,
काश, मैं तुम्हारे और करीब आया होता।
काश, मैने मिलाई होती तुमसे नजरें,
काश, तुम्हारा हात मेरे हातों में थामा होता।।

काश, मैने बढने दिया होता सांसो को,
और, धड़कनों का शोर तुमको सुनाया होता।
एक हो ही जाती दिल की धड़कनें,
काश, मैने तुम्हें सीने से लगाया होता।।

Thursday, 21 February 2019

जात-धरम सब कुछ

जात-धरम सब कुछ गवाॅ बैठा हूं,
तेरी मुहब्बत में इन्सान हुआ बैठा हूं।
नींद तो ले गई हो तुम मगर फिर भी,
खुली आंखों से ख्वाब सजा बैठा हूं।।

कोई रांझा तो कोई रांझना कहता है,
जाने जमाने को क्या बता बैठा हूं।
मिलाकर आब-ए-जमजम को गंगा में,
प्यास बुझने की आस लगा बैठा हूं।।


Monday, 18 February 2019

चाँद बेदाग निकले क्या...

चाँद बेदाग निकले क्या,जमाना शाद निकले क्या।
भरी महफिल में जुबां से मेरीअब आग निकलें क्या।।

कुछ ऐसा है बरताव बेगैरत जमाने का।
तारीफ में अब जमाने की,जनाब निकलें क्या।।

जमाने को रक्खा है,ठोकर पे यूं हमने।
कोई अच्छा निकले क्या, कोई खराब निकले क्या।।

तेरी तन्हाई की महफ़िल सजाते यार ये 'वसीम' 
भला अब चाय निकले क्या,या शराब निकले क्या।।



वाट


हो, पुन्हा तीच संध्याकाळची, अंधाराची वाट पाहण्याची वेळ,
हो पुन्हा तीच... 
सकाळी थोडा उशीर झाला उठायला,
पण सूर्य कोणाची वाट पाहत नाही. 
वाट पाहायचा मक्ता घेतलाय तो फक्त स्रीने... 

प्रत्येक वेळी योग्य वेळेची वाट पाहण्यात
अख्ख आयुष्य निघून जातं,
दुपारी जेवायला येणाऱ्या मुलांपासून
ते रात्री पिऊन येणाऱ्या नवऱ्यापर्यंत,
कुटुंबाच्या वेळेची काळजी करता करता
वेळ कशी निघून जाते ते तिचं तिलाच कळत नाही... 

दिवसा ती तांब्या घेऊन बाहेर जाऊ शकत नाही,
"मानवी श्वापदांची" भीती असते
म्हणूनच कि काय कदाचित जंगली श्वापदांपासून
अगदी साप-विंचवापर्यंत कोणाचीही
भीती न बाळगता ती अंधारात निघते
आणि मग विषारी सापांच्या रोषाला बाली पडते,
किंवा मग घडतं बदायूं सारखं काहीतरी... 

हा इतका त्रासही स्री-माउली साठी कमीच होता,
म्हणूनच की काय देवानं जगाच्या पुनर्निर्मितीचं
दिलेलं 'वरदान'च तिच्यासाठी 'शाप' ठरतं... 

"त्या" दिवसात तिची होणारी कुचंबणा
ना कोणी समजून घेणारं असतं,
ना कोणी समजून घेऊ शकतं,
झिजलेल्या कपड्याच्या चिंध्या जपून कोणाला दिसू नये,
कळू नये म्हणून घरातल्या कोपऱ्यात किंवा
कच्च्या न्हाणीच्या दगडाखाली गुंडाळून ठेवत,
ती आपलं स्त्रीत्व जपत फिरते,
आणि शेवटी मग योनी मार्गाचे आजार सहन करण्यास तत्पर.
फक्त एक वैयक्तिक स्वच्छतेची व आरोग्याची काळजी
घेण्याच्या माफक सुविधा न मिळाल्यामुळे...

अशा कारणामुळेच कदाचित मुली जन्माला येत नसाव्यात,
आल्या तर 'जगत' नसाव्यात आणि जगल्या तर... 
आणि जगल्या तर पुन्हा तीच संध्याकाळची अंधाराची वाट पाहण्याची वेळ,
हो पुन्हा तीच संध्याकाळची अंधाराची वाट पाहण्याची वेळ..... 

Monday, 11 February 2019

जज़्बात जरा तोल दो...

खुलती हवा में जुल्फों को जरा खोल दो,
दिल की बात अाझादी से बोल दो।
कब तक करोगी दरख्वास्त जमाने से,
की मेरे जज़्बात जरा तोल दो।।

है मुहब्बत तो हाॅ, आझादी है तुम्हें,
नहीं तो ना, ये भी आझादी है तुम्हें।
जो चुप्पी होटों पे लगा रख्खी है तोड दो,
कब तक करोगी दरख्वास्त जमाने से,
की मेरे जज़्बात जरा तोल दो।।

जलता है जमाना, जज़्बात पाता है गलत,
मोल जज्बातों का अक्सर लगाता है गलत।
ना हो पैसा जब तक कहीं कोई,
सब जमाने को वो नजर आता है गलत।।
तुम्हारा भी लगा है गलत मोल बोल दो,
कब तक करोगी दरख्वास्त जमाने से,
की मेरे जज़्बात जरा तोल दो।।

Friday, 25 January 2019

अंधेरे और उजाले के बीच...


अंधेरे और उजाले के बीच,
कहीं शाम के वक्त,
जहॉ गम का अंधेरा है,
ख्वाबों में सवेरा है,
और मांगे की हसी से चराग जलते हैं,
रोशन सितारे भी जहां गर्दीशों में मिलते हैं,
कुछ फूल हैं जो अपनी शाखों से,
खिलने से पहले ही, टूटकर बिखरते हैं,
सुना है फरिश्ते भी इन राहों से,
करके बंद आंखें गुजरते हैं,
मैं इन्हीं राह पर तो चलता हूं,
खो के खुद को सभी को मिलता हूं,
अंधेरे और उजाले के बीच,
कहीं शाम के वक्त...

Saturday, 19 January 2019

देखा ना सुना

आज ही आज है, कल मैने देखा ना सुना,
एक रात कोई अपना हुआ, फिर उसे देखा ना सुना।
इक फूल वो शजर से टूटकर जो गिरा,
खुशबू को उसकी किसीने फिर कभी देखा ना सुना।।

सुना था के रात के बाद दिन निकलता है जरूर,
इक रात के दिन को किसीने, फिर कभी ना देखा ना सुना।
सारे तारे चांद के संग झिलमिलाते रह गए,
किस्सा सुरज का किसीने फिर कभी देखा ना सुना।।

बस मुहब्बत ही इबादत, और तो कुछ है नहीं,
रिश्ता तेरा मेरा किसीने, फिर कभी देखा ना सुना।
कब तलक ऐसी इबादत तुम करोगे ऐ 'वसीम'
पाई जन्नत यूं किसीने ना कभी देखा ना सुना।।

Saturday, 12 January 2019

सब में एक हैं, एक में सब

 सब में एक हैं, एक में सब,
 हम ये सब जाने कब।
 धर्म जात पे लड़ रहे हैं,
 इन्सा को पहेचाने कब।।

कुछ पत्थर के बन बैठे हैं, 
कुछ तो दिखते भी नहीं।
नाम पे जिनके लड़ रहे हैं,
इन्सा गोरे काले सब।।

वो काफिर है रहेमत से तो,
मैं भी काफिर हो जाऊं।
बंद कर दूं मंदिर मस्जिद,
लगा दूं इनपे ताले सब।।

अपनी बात नहीं बतलाते,
औरों की बतलाते हैं।
काला दिल लिए बैठे हैं,
खोटी नियत वाले सब।।