जात-धरम सब कुछ गवाॅ बैठा हूं,
तेरी मुहब्बत में इन्सान हुआ बैठा हूं।
नींद तो ले गई हो तुम मगर फिर भी,
खुली आंखों से ख्वाब सजा बैठा हूं।।
कोई रांझा तो कोई रांझना कहता है,
जाने जमाने को क्या बता बैठा हूं।
मिलाकर आब-ए-जमजम को गंगा में,
प्यास बुझने की आस लगा बैठा हूं।।
No comments:
Post a Comment