Monday, 18 February 2019

चाँद बेदाग निकले क्या...

चाँद बेदाग निकले क्या,जमाना शाद निकले क्या।
भरी महफिल में जुबां से मेरीअब आग निकलें क्या।।

कुछ ऐसा है बरताव बेगैरत जमाने का।
तारीफ में अब जमाने की,जनाब निकलें क्या।।

जमाने को रक्खा है,ठोकर पे यूं हमने।
कोई अच्छा निकले क्या, कोई खराब निकले क्या।।

तेरी तन्हाई की महफ़िल सजाते यार ये 'वसीम' 
भला अब चाय निकले क्या,या शराब निकले क्या।।



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