Wednesday, 26 June 2019

दिल कबूतर

दिल कबूतर कबूतर दिल कबूतर रे
दिल कबूतर कबूतर दिल कबूतर।
बैठे कभी इस शाख पर उस शजर पर रे
कबूतर दिल कबूतर,
ना कोई भाये इसको, लड़ाई चोंच सभी से रे,
कबूतर दिल कबूतर।।

होकर रहना किसीका आदत नहीं इसकी,
वफा किसी से करने की फितरत नहीं इसकी,
उतर जाए कभी इसके, कभी उस के छत पर,
कबूतर दिल कबूतर...

आवारागर्दी से, हैरान है ये,
खुद अपनी आदतों से परेशान है ये,
सोच रहा है कैसे बनें खुद से ही बेहतर,
कबूतर दिल कबूतर...

मोहब्बत है दिल में है, आजादी प्यारी इसे,
बेबाक हवाओं से, है यारों यारी इसे,
कभी उतरे मंदिर पे, मस्जिद पे जाये उतर,
कबूतर दिल कबूतर...

बैठे कभी इस शाख पर उस शजर पर रे
कबूतर दिल कबूतर...


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