Thursday, 29 August 2019

कई टुकड़ों में बटती जा रही है

जिंदगी कई टुकड़ों में बटती जा रही है,
बस दिखावे में सिमटती जा रही है।

कोई पैदा हो सिख तो, सुरिंदर हो,
हो हिन्दू तो, राम या नरिंदर हो,
हो मुसलमान तो हो ओसामा या ओवैसी,
हो बौद्ध तो, भीम या गौतम हो,
जात धरम में कितने, बटती जा रही है,
बस दिखावे में सिमटती जा रही है।

इस आगे हम नहीं बढ़नेवाले,
किसी इन्सा के लिए हम नहीं लड़नेवाले
अपने छोटी सी दुनिया में सिमट जाएंगे हम,
कीड़े की तरह जी कर, मर जाएंगे हम,
इंसानियत अब मिटती जा रही है,
बस दिखावे में सिमटती जा रही है।

है तोडना दिल का अब मजाक की बात,
संजीदा बात मेरी, बाकी है मजाक की बात,
जब भी करता हूं मैं यारों में बस नाम की बात,
भूल जाता हूं मैं अक्सर संविधान की बात,
वो liberty, equality, fraternity नहीं याद आ रही है,
बस दिखावे में सिमटती जा रही है।

जिंदगी कई टुकड़ों में बटती जा रही है,
बस दिखावे में सिमटती जा रही है।

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