मेरी आशिकी है तारीफ रब की,
तेरा गुरूर तेरे हुस्न का है।
तेरा हुस्न है मेरे रब का,
बेखबर क्या तुझे इतना पता है।।
तू जो इतराए यू जो अपने हुस्न पर।
सुरज भी तो ढलता है शाम को मगर।।
याद तुझको रहती नहीं, बात ये अगर,
बता इसमें मेरी भला, क्या खता है।।
तारीफ तेरे हुस्न की, जब करता हूं मैं,
हर लफ्ज़ में अपने रब को मिलता हूं।
माना है मुझमें बुराई लाख मगर,
कोई बुरा खयाल दिल से लापता है।।
तेरा गुरूर तेरे हुस्न का है।
तेरा हुस्न है मेरे रब का,
बेखबर क्या तुझे इतना पता है।।
तू जो इतराए यू जो अपने हुस्न पर।
सुरज भी तो ढलता है शाम को मगर।।
याद तुझको रहती नहीं, बात ये अगर,
बता इसमें मेरी भला, क्या खता है।।
तारीफ तेरे हुस्न की, जब करता हूं मैं,
हर लफ्ज़ में अपने रब को मिलता हूं।
माना है मुझमें बुराई लाख मगर,
कोई बुरा खयाल दिल से लापता है।।
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