जुल्फों को झटक कर तेरा बांध लेना,
धीरे से रात का सुबह होना।
वो मंजर तेरे दीदार का,
नामुमकिन है लफ़्ज़ों में बयाॅ होना।।
मेरे इस दिल से पूछो,
सुनने को जो तरसता है।
बातों से किसी की यूं,
बचपन का गुमाॅ होना।।
ये मासूमियत ही है,
'अक्शा' जो मिली है तुझको।
शायद ही देखा होना,
शायद ही सुना होना।।
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