Wednesday, 10 June 2026

वो कहानी

मैं नहीं चाहता वो कहानी दोहराई जाये 
छुपाकर पानी आग लगाई जाये 
झुलसकर मरनेवालों की चींखे सुनाई दें तो 
कान में पैसों की रुई दबा दी जाये 

बच्चा मर गया भूख से, उसे भूख पता नहीं 
सजा भुगत ली मगर, गुनाह पता नहीं 
वो खाते है हाजमोला, हक़ खाने के बाद 
एक हम है जिन्हे अपना हक़ पता नहीं 


भूक लगी तो सोच रहा हूँ 
इक मशीन बना दी जाये 
रोटी को डालकर रोटी की 
कई कॉपियां बना ली जायें 

हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई ,
सब में इक इक बाटी जाये 
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई ,
सब में इक इक बाटी जाये



यूं तो कमी नहीं है लड़कियों की दुनियाँ में 

लेकिन उनकी बात अलग है 

जो मेरे ख्यालों को अपने जुबाँ से कहती है 

और नेक राह पर चलती रहती हैं 


वो जब जिंदगी की बात करती है 

तो सारे गम , सारी खुशियाँ ,

एक माला में पिरो जाते हैं 


वो जब अहसासों की बात करती है 

तो माँ के पहलु से ले कर 

दोस्त के कंधे तक 

सारे अहसासात याद आते है 


वो जब मस्ती मजाक करती है मेरे साथ 

तो मैं रब का शुक्र अदा करता हु उस पल के लिए 

यूं तो कमी नहीं है लड़कियों की दुनियाँ में 

लेकिन उनकी बात अलग है 


मैं मिला हूँ ऐसीही कुछ लड़कियों से 

उन में से एक ने मुझे दीन की राह दिखाई 

और एक इन्सान बनने के करीब ले आई 

अल्लाह उन्हें खुश रक्खें 



Thursday, 13 February 2020

निंदिया रानी आजा ना...

निंदिया रानी आजा ना,
सपना कोई दिखा जा ना।
इस अंधेरी रात में,
साथ मेरा निभा जा ना।।

मम्मी मुझसे दूर है,
डैडी भी तो साथ नहीं,
रात अंधेरे डर लगता है,
और तो कोई बात नहीं,
कान में मेरे धीरे से,
लोरी कोई सुना जा ना,
निंदिया रानी आजा ना...

झिरझिरी कंबल है मेरी,
सर्दी मेरे पास ही है,
मम्मी डैडी की गोदी की,
गर्मी का एहसास भी है,
उनके चाहत की कंबल,
तू ही मुझको उडा जा ना,
निंदिया रानी आजा ना...

तू क्या जाने दूर अपने,
घर से रहना क्या होता है,
चार दिवारी, छत के नीचे,
दुनिया का निशॉ होता है,
तुझको उस दुनिया का वास्ता,
सपना वो ही दिखा जा ना,
निंदिया रानी आजा ना...

Thursday, 16 January 2020

दादी का पल्लू

दादी का पल्लू छूट गया,
तो बचपन हमसे रूठ गया।
अब रात जागते रहेता हूं,
सपनों से भागते रहेता हूं।।

दादी की कहानी कोई नहीं,
वो लोरी सुहानी कोई नहीं।
नींद खींच के जो लाए,
जंजीर पुरानी कोई नहीं।।

मै करके बंद आंखों को,
उस घर में फिर से जाता हूं।
उस नादाॅ बचपन को फिर से,
मै बार बार दोहराता हूं।।

जब आंखे खोलकर देखा तो,
मै वक्त से आगे आया हूं।
है गम के वहां जो मेरा था,
वो वक्त छोड़कर आया हूं।।

जो बांध के मुझको रक्खे वहां,
वो वक़्त का धागा कोई नहीं।
मै रुकना तो चाहता था मगर,
इस वक्त से भागा कोई नहीं।।

दादी का पल्लू छूट गया,
तो बचपन हमसे रूठ गया,
अब रात जागते रहेता हूं,
सपनों से भागते रहेता हूं...

Tuesday, 7 January 2020

हुकूमत का सूरज

बाहर, ये इन्कलाब के नारे कौन लगा रहा है,
ऐसे लग रहा है, कोई हमें बुला रहा है।
आजादी की लड़ाई तो मेरे पुरखों ने लडी थी,
ये आज मुझमें खून क्यूं उबला जा रहा है।।

जुल्म तो जुल्म है, हिन्दू पे हो या मुसलमां पे,
कौन धरम के नाम पर देश तोडता जा रहा है।
आज़ादी की जंग लड़ने बच्चे सड़क पे निकले है,
कौन इनपे हमला करके मुस्कुरा रहा है।।

उन से कहो मन की बात बाहर आ कर कर लें कभी,
सरकार होकर, सरकार के पिछे छिपता जा रहा है।
देखना आसमाॅ में खुं से सुर्खी नजर आएगी,
समझना हुकूमत का सूरज ढलता जा रहा है।।