Saturday, 13 July 2019

जाने कितने वसीम हैं मुझमें

जाने कितने वसीम हैं मुझमें,
मै कितना अजीब सा हूं।
साथ में खुद के बचपन से हूं,
खुद को ढूंढता रहता हूं।।

वो वसीम जो नादाॅ है,
गया नहीं लडकपन है।
भरी जवानी में भी सूझता,
उसको हर पल बचपन है।।

इक वसीम वो भी है,
जो शायर बना फिरता है।
किस्से, कहानियों के बीच,
वो लायब्रेरी में मिला करता है।।

इक वसीम वो है,
जो गाता और बजाता है।
धुन में अपनी होता है और,
अपनी ही धुन गाता है।।

एक वसीम वो है,
जो यारों के संग रहता है।
कभी झूटी, कभी सच्ची,
बातें कई करता है।।

इक वसीम जो देख के दुनिया,
दुनिया से उखड़ता है।
देख के जुल्मों सितम सारे,
आंखें बंद करता है।।

इक वसीम जो खोया है,
कहीं रात अंधेरे में।
ना मिले तो बेहतर है...
ना मिले तो बेहतर है...

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