Monday, 9 September 2019

श्रावणबाळ

फर्ज का कर्ज अदा कर दूं, एहसान का इंतजाम कैसे करुं।
मैं गांजा शराब पीकर, माॅ-बाप को सलाम कैसे करूं।।

मैं ही था उनके सारी, जिंदगी भर की कमाई और।
बुरी लत में खुद को मैं, खर्च तमाम कैसे करूं।।

मजबूत चाहिए लाठी वो, जिसको सहारा बनना है।
अपनी कमजोरी का जिक्र, सरे आम कैसे करूं।।

बैठ के जिनके कंधे पर, दुनिया देखी थी मैंने।
उन बूढे कंधों की मैं, अब शाम कैसे करूं।।

जाने क्यूं स्कूल में हमको, श्रावणबाळ पढ़ाते थे।
मैं थोडी ना श्रावणबाळ हू, माॅ-बाप की खिदमत कैसे करुं।।

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