आज ही आज है, कल मैने देखा ना सुना,
एक रात कोई अपना हुआ, फिर उसे देखा ना सुना।
इक फूल वो शजर से टूटकर जो गिरा,
खुशबू को उसकी किसीने फिर कभी देखा ना सुना।।
सुना था के रात के बाद दिन निकलता है जरूर,
इक रात के दिन को किसीने, फिर कभी ना देखा ना सुना।
सारे तारे चांद के संग झिलमिलाते रह गए,
किस्सा सुरज का किसीने फिर कभी देखा ना सुना।।
बस मुहब्बत ही इबादत, और तो कुछ है नहीं,
रिश्ता तेरा मेरा किसीने, फिर कभी देखा ना सुना।
कब तलक ऐसी इबादत तुम करोगे ऐ 'वसीम'
पाई जन्नत यूं किसीने ना कभी देखा ना सुना।।
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