Thursday, 26 July 2018

जब लड़ता हूँ खुद से...

जब लड़ता हूँ खुद से, 
तब दुनिया से लड़ पाता हूँ
दर्द बहोत सहता हूँ
तभी सुकून बहोत पाता हूँ

मैदान में जैसे एक जंग छिड़ी होती है
सारे ground की नजरें हम पर ही गड़ी होती हैं
हम football लेकर दौड़ रहे होते हैं
सामने opponent की दिवार खड़ी होती है
जी जान लगाकर मैं उनसे भीड़ जाता हूँ
जब लड़ता हूँ खुद से, तब दुनिया से लड़ पाता हूँ


चोट लगती है, बदन छील जाता है
शायद ही किसी नजर में ये आता है
मरहम जख्मों को ठंडा कर जाता है
यारों की वाहवाही लूटके 
तालियों पे मुस्कुराता हूँ
जब लड़ता हूँ खुद से, तब दुनिया से लड़ पाता हूँ


कोई पूछे ये जिंदगी क्या है
धूल मिट्टी में ये ख़ुशी क्या है
जो न समझे मेरे जुनूँ को कभी
मुर्दा उनकी ये जिंदगी क्या है
यहीं बात मैं सबको बतलाता हूँ
जब लड़ता हूँ खुद से, तब दुनिया से लड़ पाता हूँ



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