Wednesday, 18 July 2018

लफ्ज बरस जाते है!

अजान से भी मीठे लफ्जो से
अम्मी सुबह जागाती है,
तब जाकर मेरी सुबह
रोशन हो जाती है!

वो झगडालु लफ्ज बहन के
जब मुझको याद आते है,
शोर मे भी कान मेरे
सुने सुने हो जाते है!

अब्बा के लफ्जो मे मुझको
दिखता है बुढापे का साया,
घर जाता हु तो कहते है,
“बेटा, बहोत दिनो बाद आया!

जब कभी मुझको
ये लफ्ज याद आते है,
आखों से बनके आसू
वो सारे बरस जाते है!

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