जिस तिनके पे ना ऐतबार था मुझको,
मै डूबने लगा तो वहीं काम आया।
पलट गई बाज़ी मैदान-ए-जंग की,
आगाज क्या था, क्या अंजाम आया।।
जब उम्मीद न थी प्यास बुझने की,
तभी मेरे हाथों में जाम आया।
गुम होने लगा जब छोड़कर दुनियादारी,
तभी दुनिया का सलाम आया।।
वक़्त पर सच किसी ने ना कहा,
जुबां पे बस झूट तमाम आया।
छोड़ दे किसको बहेलाता है 'वसीम',
झुटों में तेरा ना नाम आया।।
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