इन्सा को इन्सान से नफ़रत जुदा करें,
फिर कौन अपनी दोस्ती का हक अदा करें।
मुझे मेरे यारों का मजहब ना बताओ,
कोई पूजा किया करें, कोई सजदा किया करें।।
हैं हिन्द की मिट्टी में उगे हम चमन के फूल,
लाएँ बहार और, खुलकर खिला करें।
वो एक ही हवा है जो खुशबू बहाती है,
चंपा खिला करे या चमेली खिला करें।।
मजहब में ना बांधो उस पाकीजा जमीं को,
जिस से निकलें पानी और प्यास बुझा करें।
मिल जाए जब गंगा और जमना का पानी,
कौन भला अब ये, पानी जुदा करें।।
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