Thursday, 13 December 2018

लोकल


कीड़े की जिंदगी मैं छोड़ कहां जाऊ,
लोकल की जिंदगी मैं छोड़ कहां जाऊ।
अपने लिए रोटी, मुश्किल से तो लाता हूं,
अपने लिए अलग से गाडी कहां से लाऊं।।

मैं हूं वो पत्थर जो बुनियाद में लगता है,
चोटी पे इमारत की मैं कैसे भला जाऊं।
दबना अब तो अपनी आदत सी बन गई है,
घर, लोकल, जिम्मेदारी, बस दबता चला जाऊं।।

ये किस्सा है बहोत का, मैं हिस्सा हूं बहोत का,
किस किस की बात सोंचु, किस किस की आेर जाऊं।
मैं भीड़ का हिस्सा हूं, मुझे भीड़ में रहेने दो,
होकर मैं जुदा इनसे, पलभर में पिचक जाऊं।।

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