Saturday, 29 December 2018

फुरसत

तेरे गम तेरे गिले तेरे शिकवे, 
सुनने की फुरसत निकाल लूंगा,
तू मिल कभी मुहब्बत की राह पर, 
मिलने की फुरसत निकाल लूंगा।
अकेली रहती है, ये तो कोई बात नहीं,
दुकेली रह, मै फुरसत निकाल लूंगा।।
तेरे रूप की है बात तो तू सोच भी मत,
मेहताब मैं कई सारे तुझसे निकाल लूंगा।
तू गुमसुम, चुप जो रहेती है,
मै बात कोई तुझसे निकाल ही लूंगा।।



Friday, 28 December 2018

शमा-परवाने

वही शमा वही परवाने हैं,
उसी चमक के दीवाने हैं।
सूरत बदलती जानी है,
किरदार वही रहे जाने हैं।।

ना पूछ ये कैसी शिद्दत है,
ना पूछ ये क्या मुहब्बत है।
ये सारे परवाने ऐसे,
जिस आग में जल-जल जाने हैं।।

तुझे देख रहे थे...

हसीं लम्हों की बात हो रही थी,
और हम तुझे देख रहे थे।
हुस्न ओ इश्क की बात हो रही थी,
और हम तुझे देख रहे थे।।

यूं तो महेफिल च नाचनेवाले थे बहोत
और हम तुझे देख रहे थे।
मिल जाता हमें मिलने को साथी कोई,
मगर हम बस तुझे देख रहे थे।।

Monday, 24 December 2018

हमेशा देर कर देता हूं मैं

हमेशा देर कर देता हूं मैं,
सुबह जल्दी से उठना हो,
ब्रेकफास्ट करने जाना हो,
लगाकर ब्रेड को बटर,
जल्दी टोस्ट बनाना हो,
हमेशा देर कर देता हूं मैं।

जाकर क्लास में जल्दी,
अटेंडेंस लगाना हो,
असाइनमेंट करके आना हो,
प्रिंट आउट लेके आना हो,
हमेशा देर कर देता हूं मैं।

हो श्याम को पहेचान किसी हुस्न वाले से,
साथ उसके वक़्त थोडा सा बिताना हो,
कभी इजहार करना हो, कोई इकरार करना हो,
हमेशा देर कर देता हूं मैं।

(मुनीर नियाज़ी के कलाम से मुतासिर)

Monday, 17 December 2018

इन्सा को


इन्सा को इन्सान से नफ़रत जुदा करें,
फिर कौन अपनी दोस्ती का हक अदा करें।
मुझे मेरे यारों का मजहब ना बताओ,
कोई पूजा किया करें, कोई सजदा किया करें।।

हैं हिन्द की मिट्टी में उगे हम चमन के फूल,
लाएँ बहार और, खुलकर खिला करें।
वो एक ही हवा है जो खुशबू बहाती है,
चंपा खिला करे या चमेली खिला करें।।

मजहब में ना बांधो उस पाकीजा जमीं को,
जिस से निकलें पानी और प्यास बुझा करें।
मिल जाए जब गंगा और जमना का पानी,
कौन भला अब ये, पानी जुदा करें।।

Thursday, 13 December 2018

नज़दीकियां


नज़दीकियां बढ़ीं है, तेरे साथ रहते रहते,
अरमान रुके हैं आ के, तेरे पास बहते बहते।
जानू ना नाम तेरा, तेरा देश मैं न जानू,
तुझे मेरा कह रहा हूं, तुझे अपना कहते कहते।।

कब तक चुभेगी हमको, जमाने भर की नजरें,
कब तक रहेंगे ऐसे, हम दर्द सहते सहते।
चल छोड़ कर जमाना, हैं दूर चले जाते,
ये छाप-तिलक वाले, हमें ढूंढते ही रहते।।

लोकल


कीड़े की जिंदगी मैं छोड़ कहां जाऊ,
लोकल की जिंदगी मैं छोड़ कहां जाऊ।
अपने लिए रोटी, मुश्किल से तो लाता हूं,
अपने लिए अलग से गाडी कहां से लाऊं।।

मैं हूं वो पत्थर जो बुनियाद में लगता है,
चोटी पे इमारत की मैं कैसे भला जाऊं।
दबना अब तो अपनी आदत सी बन गई है,
घर, लोकल, जिम्मेदारी, बस दबता चला जाऊं।।

ये किस्सा है बहोत का, मैं हिस्सा हूं बहोत का,
किस किस की बात सोंचु, किस किस की आेर जाऊं।
मैं भीड़ का हिस्सा हूं, मुझे भीड़ में रहेने दो,
होकर मैं जुदा इनसे, पलभर में पिचक जाऊं।।

Sunday, 9 December 2018

यार तुझे ऐसा क्यू लगता है...

यार, तुम्हें ऐसा क्यू  लगता है 
वो देख के मुस्कुराई तो तुझे प्यार ही करती होगी 
तेरे ब्रैंडेड इंटीरियर पे वो जरूर मरती होगी 
यार तुझे ऐसा क्यू लगता है 

यार तुम्हें ऐसा क्यू लगता है के 
DH मैं बैठ के अकेले breakfast कर रही है 
तो वो दुःखी है 
कभी घर की यादो को आसुओं से हल्का कर रही है 
तो वो दुःखी है 
कभी friend के कंधे पे सर रख कर सुकून की साँसे ले रही है 
तो वो दुःखी है 
बस एक तुम ही हो जिसके साथ वो सुखी रह सकती है 
यार तुम्हें ऐसा क्यू लगता है

यार तुम्हें ऐसा क्यू लगता है के 
उसने पुरे कपडे पहने है तो वो दुनियादारी नहीं समझती,
डरी, सहमी हैं, उसे कुछ पता नहीं होगा
उसने अगर छोटे कपडे पहने है तो वो बहोत बोल्ड है 
बहोत advance है, उसे हमेशा सेक्स करने का मन होता होगा, 
यार तुम्हें ऐसा क्यू लगता है

यार तुम्हें ऐसा क्यू लगता है के 
किसी के साथ वो हसके बात कर रही है 
Breakfast dinner साथ कर रही है 
तो उसका कुछ चक्कर चल रहा है, जो बुरा है 
(तुम्हारे साथ चलता तो अच्छा होता)
यार तुम्हें ऐसा क्यू लगता है

यार तुम्हें ऐसा क्यू लगता है के 
दिल सिर्फ तुम्हारे पास है, उसके पास है ही नहीं 
उसका दिल किसी पे आ ही नहीं सकता, ये अच्छी हरकत ही नहीं 
वो किसी को I Love You नहीं कह सकती, इसकी इजाज़त ही नहीं 
यार तुम्हें ऐसा क्यू लगता है

मेरे यार, मेरी एक बात मान 
अपने दिल को साफ़ कर और ये बात जान 
सब के पास दिल है, जैसे तुझे है, वैसे उसे है 
सब के पास आज़ादी है, जैसे तुझे है, वैसे उसे है



जिस तिनके पे...

जिस तिनके पे ना ऐतबार था मुझको,
मै डूबने लगा तो वहीं काम आया।
पलट गई बाज़ी मैदान-ए-जंग की,
आगाज क्या था, क्या अंजाम आया।।

जब उम्मीद न थी प्यास बुझने की,
तभी मेरे हाथों में जाम आया।
गुम होने लगा जब छोड़कर दुनियादारी,
तभी दुनिया का सलाम आया।।

वक़्त पर सच किसी ने ना कहा,
जुबां पे बस झूट तमाम आया।
छोड़ दे किसको बहेलाता है 'वसीम',
झुटों में तेरा ना नाम आया।।

Friday, 7 December 2018

बनके अाईना

बनके अाईना हम जिनसे मिलते हैं,
वो लोग हमसे नफरत सी करते हैं।
अपनी तो बेबाक जिंदगी है बहोत,
हम कहां टूटने से डरते हैं।।

राह-ए-अदब की चलते हुए,
बस शराफत को दिल में रखते हैं।
अकीदत है तो है बस उर्दू पे,
जमाने से बगावत का हुनर रखते हैं।।

उतनी औकात जमाने की अब रही ही नहीं,
सोचा साझा कोई खयाल करते हैं।
हैं कुछ यार, हमें देख मुस्कुराते हैं,
शामें कुछ उनके संग गुजार करते हैं।।

Thursday, 6 December 2018

ये कभी ना कभी होना था...

जानता था, ये कभी ना कभी होना था,
फासला ज्यादा होना था, रास्ता जुदा होना था।

लेकिन ये नहीं पता था के रास्ते फिर मिलेंगे,
हम, जो इक दूजे के बस कॉल की ही उम्मीद कर सकते थे,
अचानक इक दूजे के रूबरू होंगे,
जैसे हम मिलना चाहते हो, जैसे कोई मिलाना चाहता हो,

लेकिन अब मै वो मैं नहीं रहा, ना ही तुम वही तुम हो,
पहले मै तुम्हें देखता तो तुम्हारी ओर दौड़ा चला आता,
तुम भी मेरी बातों पर खिलखिलाकर हस देती,

लेकिन अब ऐसा कुछ नहीं होता,
हां, तुम्हे देखकर मेरी आंखों में चमक अा तो जाती है,
और मुझे देखकर तुम दूर से ही मुस्कुराती हो,
लेकिन अब मै वो मैं नहीं रहा, ना ही तुम वही तुम हो,
और ना मैं तुम्हारे साथ हूं, ना तुम मेरे साथ हो,

ख़ैर, ये कभी ना कभी होना था,
फासला ज्यादा होना था, रास्ता जुदा होना था...

Wednesday, 5 December 2018

पॉजिटिव

वो पुछते हैं, कुछ अच्छा क्यू नहीं लिखते,
ग़म के नगमें लिखते हो, 
खुशी के किस्से क्यू नहीं लिखते।

दूर से भी आंखों में आसू देख लेते हो,
पास में देखी मुस्कानें, 
क्यू नहीं लिखते।।

यूं तो तुम शायर बने फिरते रहेते हो,
हमेशा नेगेटिव लिखते हो, 
पॉजिटिव क्यू नहीं लिखते।