फिक्र जिनकी की होती है, वो जमात ही कुछ और है,
कुत्ता हूं मैं सड़क का, मेरी बात ही कुछ और है।
गंदा सा रहेता हूं मैं, टुकडों पर पलता हूं,
मेरा दिन कुछ और है, मेरी रात ही कुछ और है।।
ना इंसान बनाओ मुझे की मै गिरना चाहता नहीं,
इंसान धोखेबाज हैं मेरी बात ही कुछ और है।
मुझे मेरे मालिक की जुस्तजू, मुझे मेरी रोटी से प्यार है,
चाहे हिन्दू हो या मुसलमां हो, वो बात ही कुछ और है।।
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