जीतकर दुनिया खुदसे हारने के लिए,
मेरा "मैं" ही काफी है, मुझे मारने के लिए।
हसींन शख़्स कोई सर को झुकाये क्यूँ हैं,
ठोकरें मिलती है शख़्सियत निखारने के लिए।।
वो दरख़्त जिनके सर, आसमान में हैं,
मिली है उनको जमीं, तने गाढ़ने के लिए।
गुरुर पंखों पे करके तू चला जा उड़कर,
अहमियत शाख़ पर घरौंदे की जानने के लिए।।
वो पंछी छोड़ गए है जो अब चमन अपना,
बहार आये तो किसको बहारने के लिए।
मेरा जमीं से वास्ता है, आ गया वापस,
कोई तो आये नजर मेरी उतारने के लिए।।
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