Thursday, 16 January 2020

दादी का पल्लू

दादी का पल्लू छूट गया,
तो बचपन हमसे रूठ गया।
अब रात जागते रहेता हूं,
सपनों से भागते रहेता हूं।।

दादी की कहानी कोई नहीं,
वो लोरी सुहानी कोई नहीं।
नींद खींच के जो लाए,
जंजीर पुरानी कोई नहीं।।

मै करके बंद आंखों को,
उस घर में फिर से जाता हूं।
उस नादाॅ बचपन को फिर से,
मै बार बार दोहराता हूं।।

जब आंखे खोलकर देखा तो,
मै वक्त से आगे आया हूं।
है गम के वहां जो मेरा था,
वो वक्त छोड़कर आया हूं।।

जो बांध के मुझको रक्खे वहां,
वो वक़्त का धागा कोई नहीं।
मै रुकना तो चाहता था मगर,
इस वक्त से भागा कोई नहीं।।

दादी का पल्लू छूट गया,
तो बचपन हमसे रूठ गया,
अब रात जागते रहेता हूं,
सपनों से भागते रहेता हूं...

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