यूं तो मिलाता हूं नज़रें तुमसे, हाथ मिलाने में हर्ज़ ही क्या है।
तुम्हारे हुस्न के बारिश में, भीग जाने में हर्ज़ ही क्या है।।
रात घनेरी, सुबह को देरी, सो जाने में हर्ज़ ही क्या है।
तुम्हारा खयाल, तुम्हारे सपने, अा जाने में हर्ज़ ही क्या है।।
प्यासा हूं मैं सालों से और, मयखाना भी पास नहीं।
नज़रें तुमसे पल दो पल को, मिल जाने में हर्ज़ ही क्या है।।
इक दुल्हन की कोरी हथेली, और तुम हिना कोई हो।
दुनियां मेरी कुछ ऐसे ही, सजाने में हर्ज़ ही क्या है।।
जात-धरम सब लगता है, इस दुनिया का वहम ही है।
ये सब कुछ पल को भुलाकर, मुस्काने में हर्ज़ ही क्या है।।
दिल कहेता है खुशियों पर, यूं तो हम सबका हक है।
साथ में सबके ईद-दिवाली, मनाने में हर्ज़ ही क्या है।।
No comments:
Post a Comment