Monday, 26 November 2018

गुपित

शतायुषी होण्याचं गुपित तुम्हाला सांगतो,
आमच्या घरी आम्ही रानभाज्या आणतो...

शेवगा असतो अंगणात, उंच उंच वाढलेला,
पाठी परसामध्ये असतो, अळू, वांगा पेरलेला।
हिरव्या मिरच्या, कडी पत्ता, पाहिजे तेंव्हा काढतो,
आमच्या घरी आम्ही रानभाज्या आणतो।।

घरच्या घरी भाजीपाला, रासायनिक विष नसतं,
आनंद होतो खाताना जे स्वकष्टाचं असतं।
ऋतू सोबत भाज्या बदलून गवार भेंडी काढतो,
आमच्या घरी आम्ही रानभाज्या आणतो।।

भाजी असते ताजी नसते कुपोषणाची भीती,
परसात बाग, बागेत भाज्या हीच आपली रीती।
आपल्या भल्या चाली-रीती आम्हीं देवा पाळतो,
आमच्या घरी आम्ही रानभाज्या आणतो।।

शतायुषी होण्याचा गुपित तुम्हाला सांगतो,
आमच्या घरी आम्ही रानभाज्या आणतो...

Sunday, 18 November 2018

कभी कभी लगता है की अपुन ही भगवान है...


सर पे अपने कफ़न है, हथेली पे जान है,
कदमों तले जमाना रखने का अरमान है।
जिंदगी जीते है अपने ही शर्तों पे,
कभी कभी लगता है की अपुन ही भगवान है।।

डरने वालों को डराती है ये दुनिया,
अच्छे लोगों को सताती है ये दुनिया।
दुनियादारी से अपनी पुरानी पहेचान है,
कभी कभी लगता है की अपुन ही भगवान है।।

झगड के दुनिया से जो यार पा लिया,
कर्म ही कुछ ऐसे के उसको गवॉ दिया।
बसा रहे हैं दुनियॉ जो विरान है,
कभी कभी लगता है की अपुन ही भगवान है।।

नास्तिक भी हुए, भगवान पे भरोसा भी किया,
घंटा भगवान को फर्क नहीं पड़ता, ये जान भी लिया।
हम ही भगवान है, यही हमारी पहेचान है,
कभी कभी लगता है की अपुन ही भगवान है।।

जब सितारों में लौट के जायेंगे अपुन,
हटाकर सुरज खुद जगमगाएंगे अपुन।
हर जगह चमकना अपनी शान है,
कभी कभी लगता है की अपुन ही भगवान है।।




Monday, 12 November 2018

ख़ाली हो गया घर

महेमां आकर चले गए तब ख़ाली हो गया घर,
धड़कन दिल की सुनाई दी, जब ख़ाली हो गया घर।
दो दिन लगा जैसे पल भर में ही गुजर गए,
पल सदियों सा लगने लगा, जब ख़ाली हो गया घर।।

आदत हुई थी पहेले हमको, तनहा तनहा रहेने की,
आदत टूटी पता चला जब ख़ाली हो गया घर।
बच्चे थे, शोर था, घर में रौनक लगती थी,
रौनक आकर चली गई, जब ख़ाली हो गया घर।।

जब महेमां थे घर में तो, लब पे थी मुस्कान बड़ी,
आसू अा गए आंखों में जब ख़ाली हो गया घर।
हसता खिलखिलाता घर, घर जैसा लगता था,
बस मकान रह गया, जब ख़ाली हो गया घर।।

Friday, 9 November 2018

हर्ज़ ही क्या है...


यूं तो मिलाता हूं नज़रें तुमसे, हाथ मिलाने में हर्ज़ ही क्या है।
तुम्हारे हुस्न के बारिश में, भीग जाने में हर्ज़ ही क्या है।।

रात घनेरी, सुबह को देरी, सो जाने में हर्ज़ ही क्या है।
तुम्हारा खयाल, तुम्हारे सपने, अा जाने में हर्ज़ ही क्या है।।

प्यासा हूं मैं सालों से और, मयखाना भी पास नहीं।
नज़रें तुमसे पल दो पल को, मिल जाने में हर्ज़ ही क्या है।।

इक दुल्हन की कोरी हथेली, और तुम हिना कोई हो।
दुनियां मेरी कुछ ऐसे ही, सजाने में हर्ज़ ही क्या है।।

जात-धरम सब लगता है, इस दुनिया का वहम ही है।
ये सब कुछ पल को भुलाकर, मुस्काने में हर्ज़ ही क्या है।।

दिल कहेता है खुशियों पर, यूं तो हम सबका हक है।
साथ में सबके ईद-दिवाली, मनाने में हर्ज़ ही क्या है।।

Wednesday, 7 November 2018

रात

तुम्हारे सोने के बाद आई थी,
तुम्हारे जगने से पहले चली गई।
वो रात मेरे कानों में,
एक बात कहेके चली गई।।

मैं हूं राजा रातों का,
वो रात की जैसे रानी है।
उसे इश्क़ है मुझसे बहोत,
ये बात वो कहेके चली गई।।

मेरे साथ ये जो खयाल है,
उसे इसका ही तो मलाल है।
ना कोई दिखाया ख़्वाब बस,
वो साथ निभाके चली गई।।

जो रात मेरे संग होती तो,
परछाई मेरी खो जाती है।
अपने और पराए की,
पहेचान कराके चली गई।।

Tuesday, 6 November 2018

उलझन

तुझे प्यार करूं या ना करूं, बड़ी उलझन में हूं,
चाहत पा लूं या पेट भरूं, बड़ी उलझन में हूं।
सुना था पैसा तो हाथों का मैल होता है,
हाथ कहां मैले करूं, बड़ी उलझन में हूं।।

यूं तो नहीं है सीधा, रस्ता ये दुनियादारी का,
कैसे टेढ़ा रस्ता चलूं, बड़ी उलझन में हूं।
कदम कदम पर नफ़्स को उकसाने वाली चीजें हैं,
कैसे ईनका सामना करूं, बड़ी उलझन में हूं।।

जिंदा लाश बने रहेना, जमाने को पसंद तो है,
मैं जिंदा रहूं या लाश बनूं, बड़ी उलझन में हूं।
जमाने का जहन देखो, बस नफ़रत ही नफ़रत है,
मेरे दिल की मोहब्बत क्या करूं, बड़ी उलझन में हूं।।