Thursday, 13 February 2020

निंदिया रानी आजा ना...

निंदिया रानी आजा ना,
सपना कोई दिखा जा ना।
इस अंधेरी रात में,
साथ मेरा निभा जा ना।।

मम्मी मुझसे दूर है,
डैडी भी तो साथ नहीं,
रात अंधेरे डर लगता है,
और तो कोई बात नहीं,
कान में मेरे धीरे से,
लोरी कोई सुना जा ना,
निंदिया रानी आजा ना...

झिरझिरी कंबल है मेरी,
सर्दी मेरे पास ही है,
मम्मी डैडी की गोदी की,
गर्मी का एहसास भी है,
उनके चाहत की कंबल,
तू ही मुझको उडा जा ना,
निंदिया रानी आजा ना...

तू क्या जाने दूर अपने,
घर से रहना क्या होता है,
चार दिवारी, छत के नीचे,
दुनिया का निशॉ होता है,
तुझको उस दुनिया का वास्ता,
सपना वो ही दिखा जा ना,
निंदिया रानी आजा ना...

Thursday, 16 January 2020

दादी का पल्लू

दादी का पल्लू छूट गया,
तो बचपन हमसे रूठ गया।
अब रात जागते रहेता हूं,
सपनों से भागते रहेता हूं।।

दादी की कहानी कोई नहीं,
वो लोरी सुहानी कोई नहीं।
नींद खींच के जो लाए,
जंजीर पुरानी कोई नहीं।।

मै करके बंद आंखों को,
उस घर में फिर से जाता हूं।
उस नादाॅ बचपन को फिर से,
मै बार बार दोहराता हूं।।

जब आंखे खोलकर देखा तो,
मै वक्त से आगे आया हूं।
है गम के वहां जो मेरा था,
वो वक्त छोड़कर आया हूं।।

जो बांध के मुझको रक्खे वहां,
वो वक़्त का धागा कोई नहीं।
मै रुकना तो चाहता था मगर,
इस वक्त से भागा कोई नहीं।।

दादी का पल्लू छूट गया,
तो बचपन हमसे रूठ गया,
अब रात जागते रहेता हूं,
सपनों से भागते रहेता हूं...

Tuesday, 7 January 2020

हुकूमत का सूरज

बाहर, ये इन्कलाब के नारे कौन लगा रहा है,
ऐसे लग रहा है, कोई हमें बुला रहा है।
आजादी की लड़ाई तो मेरे पुरखों ने लडी थी,
ये आज मुझमें खून क्यूं उबला जा रहा है।।

जुल्म तो जुल्म है, हिन्दू पे हो या मुसलमां पे,
कौन धरम के नाम पर देश तोडता जा रहा है।
आज़ादी की जंग लड़ने बच्चे सड़क पे निकले है,
कौन इनपे हमला करके मुस्कुरा रहा है।।

उन से कहो मन की बात बाहर आ कर कर लें कभी,
सरकार होकर, सरकार के पिछे छिपता जा रहा है।
देखना आसमाॅ में खुं से सुर्खी नजर आएगी,
समझना हुकूमत का सूरज ढलता जा रहा है।।