Friday, 25 January 2019

अंधेरे और उजाले के बीच...


अंधेरे और उजाले के बीच,
कहीं शाम के वक्त,
जहॉ गम का अंधेरा है,
ख्वाबों में सवेरा है,
और मांगे की हसी से चराग जलते हैं,
रोशन सितारे भी जहां गर्दीशों में मिलते हैं,
कुछ फूल हैं जो अपनी शाखों से,
खिलने से पहले ही, टूटकर बिखरते हैं,
सुना है फरिश्ते भी इन राहों से,
करके बंद आंखें गुजरते हैं,
मैं इन्हीं राह पर तो चलता हूं,
खो के खुद को सभी को मिलता हूं,
अंधेरे और उजाले के बीच,
कहीं शाम के वक्त...

Saturday, 19 January 2019

देखा ना सुना

आज ही आज है, कल मैने देखा ना सुना,
एक रात कोई अपना हुआ, फिर उसे देखा ना सुना।
इक फूल वो शजर से टूटकर जो गिरा,
खुशबू को उसकी किसीने फिर कभी देखा ना सुना।।

सुना था के रात के बाद दिन निकलता है जरूर,
इक रात के दिन को किसीने, फिर कभी ना देखा ना सुना।
सारे तारे चांद के संग झिलमिलाते रह गए,
किस्सा सुरज का किसीने फिर कभी देखा ना सुना।।

बस मुहब्बत ही इबादत, और तो कुछ है नहीं,
रिश्ता तेरा मेरा किसीने, फिर कभी देखा ना सुना।
कब तलक ऐसी इबादत तुम करोगे ऐ 'वसीम'
पाई जन्नत यूं किसीने ना कभी देखा ना सुना।।

Saturday, 12 January 2019

सब में एक हैं, एक में सब

 सब में एक हैं, एक में सब,
 हम ये सब जाने कब।
 धर्म जात पे लड़ रहे हैं,
 इन्सा को पहेचाने कब।।

कुछ पत्थर के बन बैठे हैं, 
कुछ तो दिखते भी नहीं।
नाम पे जिनके लड़ रहे हैं,
इन्सा गोरे काले सब।।

वो काफिर है रहेमत से तो,
मैं भी काफिर हो जाऊं।
बंद कर दूं मंदिर मस्जिद,
लगा दूं इनपे ताले सब।।

अपनी बात नहीं बतलाते,
औरों की बतलाते हैं।
काला दिल लिए बैठे हैं,
खोटी नियत वाले सब।।