Monday, 22 October 2018

जिंदगी

अरमानों का बोझ लिए चल रही है जिंदगी,
जाने किस मोड़ से गुजर रही है जिंदगी।
उम्र भर मेहनत की, हासिल ये मकाम किया,
और किस मकाम की उम्मीद, कर रही है जिंदगी।।

युं तो कहने सुनने को, कई अपने पास है,
हाल-ए-दिल कहने से क्युं, झिझक रही है जिंदगी।
बस झिझक जाने से, अपने दूर हो जाते हैं,
जान-बुझकर रिश्तों को, क्यु बिखर रही है जिंदगी।।

जानते है गुरूर की, इंतेहा मगर फ़िर भी,
जाने किस पे गुरूर, कर रही है जिंदगी।
वो कौन सा चिराग़ है, जला है और बुझा नहीं,
'नवाज़' का कलाम, याद कर रही है जिंदगी।।

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